Apr 23, 2026

प्रचार का शोर न बने जिंदगी की खामोशी का कारण, सड़क सुरक्षा समिति ने सीएम धामी को लिखा पत्र

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उत्तराखंड की सड़कों और चौराहों पर अपने पसंदीदा नेताओं के स्वागत में बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर लगाने वाले कार्यकर्ताओं के लिए अब मुश्किलें बढ़ने वाली हैं। किसी नेता का जन्मदिन हो या कोई राजनीतिक उपलब्धि, जोश में आकर सार्वजनिक स्थलों और ट्रैफिक साइन बोर्ड्स को ढकने की परंपरा अब कानून के शिकंजे में है। सुप्रीम कोर्ट की सड़क सुरक्षा समिति ने इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से लेते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक कड़ा पत्र भेजा है, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि ऐसी लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

सड़क सुरक्षा समिति के अध्यक्ष जस्टिस अभय मनोहर द्वारा भेजे गए इस पत्र में कहा गया है कि सड़कों पर लगे यातायात संकेतक (साइन बोर्ड) वाहन चालकों के लिए मार्गदर्शक का काम करते हैं। जब राजनीतिक कार्यकर्ता इन बोर्डों के ऊपर अपने पोस्टर या फ्लेक्स लगा देते हैं, तो चालक को महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश और संभावित खतरों की जानकारी नहीं मिल पाती। विशेषकर उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य में, जहाँ मोड़ और संकरे रास्ते पहले से ही चुनौतीपूर्ण हैं, साइन बोर्ड की दृश्यता कम होना सीधे तौर पर बड़े हादसों को न्योता देना है। समिति ने इस कृत्य को मोटर व्हीकल एक्ट 1988 का सीधा उल्लंघन बताया है। पत्र में चेतावनी दी गई है कि यदि कोई व्यक्ति सड़क सुरक्षा संकेतकों को बाधित करता है या उन्हें ढकता है, तो उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जानी चाहिए। इसके तहत दोषी को 6 महीने तक की जेल और भारी जुर्माना भुगतना पड़ सकता है। समिति ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और सभी जिलाधिकारियों को निर्देश दिया है कि वे इस दिशा में तत्काल सख्ती बरतें और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर एफआईआर दर्ज करें। यह सख्त निर्देश ऐसे समय में आया है जब उत्तराखंड में सड़क हादसों का ग्राफ तेजी से बढ़ रहा है। 1 जनवरी 2026 से अब तक के आंकड़े राज्य की डरावनी तस्वीर पेश करते हैं। इस संक्षिप्त अवधि में ही राज्यभर में 68 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 234 लोग घायल हुए हैं। प्रशासन का कहना है कि समर्थन व्यक्त करने का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे आम नागरिक की जान जोखिम में न पड़े। अक्सर देखा जाता है कि चौराहों पर लगे ट्रैफिक सिग्नल और दिशा सूचक बोर्डों को पूरी तरह फ्लेक्स से पाट दिया जाता है। सुप्रीम कोर्ट की इस पहल के बाद अब पुलिस और नगर निकाय की टीमें सड़कों पर अभियान चलाकर ऐसे पोस्टरों को हटाएंगी और उन्हें लगाने वाले प्रकाशकों व समर्थकों पर कार्रवाई करेंगी। सड़क पर चलते हर व्यक्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करना न केवल सरकार बल्कि समाज की भी जिम्मेदारी है। सुप्रीम कोर्ट की समिति के इस पत्र ने धामी सरकार को एक स्पष्ट दिशा दी है। अब देखना यह होगा कि धरातल पर प्रशासन इसे कितनी सख्ती से लागू करता है, ताकि सड़कों पर 'प्रचार का शोर' किसी की 'जिंदगी की खामोशी' का कारण न बने।